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Here is to The Crazy Ones, The Misfits, The Rebels, The Troublemakers.The Round Pegs in the Square Holes.... The Ones Who See Things Differently!

Wednesday, June 6, 2012

CORRUPTION-A THOUGHT

आज देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लहर दौड़ रही है। तमाम लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं । भ्रष्टाचार दिन-प्रतिदिन हमारे समाज में विष की तरह फैलता जा रहा है और हमारे समाज को खोखला कर रहा है। तरह तरह के सुझाव भी दिए जा रहे हैं भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए लेकिन क्या इनसे पूरी तरह भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा ये एक बहुत बड़ा  सवाल है।
भ्रष्टाचार(भ्रष्ट+आचार) यानि आचरण मैं असुधता अर्थात गलत ढंग से किये गये क्रिया-कलाप। अब गौर करने वाली बात लोग भ्रष्टाचार करते क्यों  है  क्योकि  इसी सवाल में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने का जवाब है।
दरसल भ्रष्टाचार एक सोच है, जिसके तहत आदमी भ्रष्ट क्रिया कलाप करता है। उसकी सोच अशुद्ध होने के फलस्वरूप वो घूस  लेता है , घोटाले करता है या अन्य कोई भी गलत कम करता है। उसकी सोच उसे गलत कम करने के लिए विवश करती है। तो यदि भ्रष्टाचार वयक्तिगत या सामाजिक सोच के तहत आता है तो इस पर रोक कैसे लगायी जाये ?
अगर पूरी तरह से भ्रष्टाचार मिटाना है  तो उसका सिर्फ एक ही उपाय है की लोगों की सोच बदले , उनके विचारों और क्रिया कलापों  में शुद्धता  आये । लोगों में इतनी बौद्धिकता का विकास किया जाये की वे सोच सके की क्या सही है क्या गलत । इस तरह तरह का सामाजिक परिवेश जब  बन जायेगा तो लोग गलत काम नहीं करेंगे और फलस्वरूप भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा ।
लेकिन क्या सबकी सोच को पवित्र और शुध किया जा सकता है? इसका जवाब है 'नहीं' ।यह एक आदर्श परिवेश होगा जिसका होना बहुत मुश्किल है।
तो अगर सोच सबकी नहीं बदल सकते तो दूसरा उपाय क्या है ? दूसरा उपाय यही है जिसकी मांग आज देश कर रहा है। हमे भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े नियम कायदे बनाने पड़ेंगे जिससे लोग दरें किसी भी गलत काम को करने से । हालाँकि ये एक हद तक ही भ्रष्टाचार पर रोक लगा पायेग। 
अंततः  सिर्फ यही कहूँगा लोग अगर अपनी सोच  में शुद्धता लायें , अपने आने वाली पीढ़ी में अच्छे  संस्कारों का विकास करें तभी हमरा समाज पूरी तरह भ्रष्टाचार के चंगुल से मुक्त हो सकेगा ।
 
 

Friday, May 11, 2012

22/28 रूपए जीने के लिए -हास या परिहास ..!!

भारत सरकार की नयी गरीबी रेखा जिसके तहत  गावों में रहने वाले 22 रूपए और शहरों  में  रहने वाले 28 रूपए  से अधिक पाते हैं तो वो गरीब नहीं हैं। इन नए आंकड़ों का हर किसी ने विरोध किया , अधिकतर लोग ये कह  रहे  हैं  कि  सरकार  ने  ऐसा  करके लाखों  लोगों  का  तबका  गरीबी  से  बाहर कर  दिया  जिससे  इनकी  साख  बच  गयी ।
ये तो खैर राजनीति का खेल है । अगर  इसके  दूसरे  पहलुओं  पर गौर  फ़रमाया  जाया तो वो काफी विचारोयोक्त  है। आज  भारत  एक  सशक्त अर्थव्यवस्था  के  रूप  में  अपने  आप  को  दुनिया  के  समक्ष  रख  रहा  है  लेकिन  अगर  इन  आंकड़ों  की  माने  तो  आज  भी  लाखों  लोग  मात्र  22  और  28  रुपये  के  लिए जूझ रहें  है , आजादी के  64 साल  बाद  भी  मात्र  22  रुपये  लाखों   लोग  नही कमा पा  रहे  है  ये  क्या  अपने  आप  में  शर्म  की  बात  नही  है ।
मूलभूत  आवश्यक्त्ओं  की  अगर बात  भी  न  की  जाय  तो  सिर्फ  दो  वक़्त  की  रोटी  के  लिए  लाखों  लोग  जदोजहत  कर  रहे  हैं।  अमीर और अमीर बनता जा रहा है और गरीब धरातल में समाता जा रहा है। ये  किस  भारतीय  अर्थव्यवस्था  को  दर्शाता  है?  अगर  इस नयी  रेखा  को  माने  तो 23  रुपये  पाने  वाला  गरीब  नहीं लेकिन  इस बढती महंगाई में  मात्र  23 रुपये में  क्या आएगा , क्या कभी सरकार   ने सोचा है ?  अगर  कुछ  नहीं  सिर्फ  आटे   और  दाल  का हिसाब जोड़े तो 16 रूपये किलो और 80  रूपये  किलो  के  हिसाब  से  मात्र 1 किलो आटा  और 100 ग्राम दाल आएगी  जिसमें  उसे  खुद  और  अपने  परिवार  का  निर्वहन  करना है  । इस  हिसाब से तो  जब खाने की आवयश्कता ही नहीं पूरी हो रही तो  बाकि जरूरते कहां  से  पूरी  होंगी । ये तो  एक बहुत बड़ी विकत स्थिति है , यहाँ  तो  हालत भूखमरी  के  हो गये हैं और सरकार  कहती  है  की  23 रूपए पाने वाला गरीब नहीं |
वैसे  हमारे  नेता  और  सरकार हमेशा  से  ही  बचते  रहे  हैं,  उनके  अनुसार भारत  में  लोग  कुपोषण  के   शिकार  जरुर  है  परन्तु  भुखमरी  नहीं  फैली  है  लेकिन  उनसे  कोई  पूछे कि   किसी  को  चार  दिन  खाना  न   मिले  तो  उसे  भुखमरी  कहेंगे या  कुपोषण । कुपोषण शब्द  का  इस्तेमाल  वो  इसलिए  करते  है   क्युओंकी  भारतीय  लोग  थोडा सुसुप्त होते  हैं  और वे ये सोचेंगे की पोषण  तो  मिल  ही  रहा  है  और  शांत  हो  जायेंगे  और  उनका  खेल  चलता  रहेगा। 
इन  नए  आंकड़ों  के  बाद  कुछ  निजी  समाज सेवकों  और  NGO  ने  भी  सर्वे  करवाया  जिसके अनुसार 105  रूपये  शहरों  में  और  66  रूपए  गावों  वों  में  पाने  वाला  गरीब  नहीं  है ।
अंत  में  सिर्फ इतना  ही  कहना  चाहूँगा  कि  जिस देश  में  अभी  भी व्यक्ति 22 रूपये (आंकड़ों  के अनुसार ) के  लिए संघर्श कर  रहा  है  वो  देश  कैसे  सशक्त  अर्थव्यवस्था  बनेगा ?  कैसे  विकास  करेगा ?  कैसे  दुनिया  के  मानचित्र  पर  अपनी छाप  छोड़ेगा ?......ये हमे , आपको  और  इस देश  की  सोयी  हुई  सरकार  को  जरुर  सोचना  पड़ेगा।

Monday, April 2, 2012

चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे ....????

जीवन मे हम लोगों ने इस वाक्य को कभी न कभी सुना जरुर होगा, और सुना ही नहीं होगा अपने ऊपर अपने सुभ्चिन्तकों द्वारा बोलते हुए भी पाया होगा ' चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे '।
जब भी उन पलों को याद किया जाता है थोड़ी हंसी आती है लेकिन वो बड़ी ही विकट स्थिति होती थी जब आप पर आपके प्रियजनों (अधिकंशाथ आपके माता-पिता ) द्वारा बोला जाता था । मन ही मन बड़ा गुस्सा भी आता होगा की आखिर ये 'चार लोग हैं कौन?' जो हर बात मैं अड़ जाते हैं और जिनका डर बहुत ज्यादा व्याप्त है । अपनी मर्जी से कोई काम ही नहीं कर सकते । बचपन से लेकर आखिरी सांस तक इन चार लोगों का डर बहुत सताता है । यहाँ मत जाओ , ये काम मत करो, ऐसे मत बोलो ऐसी तमाम चीजों के आगे ये वाक्य जरुर आ जाता था की चार लोग देखेंगे या सुनेंगे तो क्या कहेंगे ।
अब दिमाग मे यही आता है की ये चार लोग है कौन , इनके पास अपना कोई काम-धंधा नहीं है जो हमे ही देखते रहते है । इनके पास कितना खाली वक़्त है, जो सिर्फ हमे सुनने और देखने में ही लगा देते हैं और उसके बाद निष्कर्ष भी निकाल कर सब जगह बताने का भी समय निकाल आता है।
जिनके पास खुद कोई काम नहीं सिवाय दूसरों को सुनने और देखने और उसके बाद उसका निष्कर्ष भी निकलने निकलने का , उनका भय हमे क्युओं  सताता है?
इन चार लोगों क प्रभाव से हम अपने आप को बचा नहीं पाते हैं । इनके कारण इन्सान को बहुत बंदिशों मे जीना पड़ता है । महिलाओं पर तो इनका और भी प्रभाव है । उनके हर क्रियाकलाप जैसे उठाना, बैठना, चलना, कपडे आदि सभी में इनका प्रभाव है ।
क्या हमें इन्सके प्रभाव में आना चाहिए ? क्या हमे इनसे डर कर काम करना चाहिए ? आखिर ये हैं कौन?
दरसल ये चार लोग हमारे आस पास रहने वाले समाज के लोग हैं । बहुत से मामलो में इनका प्रभाव  सही होता है । बहुत से गलत काम लोग सिर्फ इसी वजह से नहीं किये जाते  कि समाज में लोग क्या कहेंगे , उनकी इज्जत खराब हो जाएगी । तो इस तरह देखें तो ये बहुत ही उपयोगी लोग हैं ।
लेकी ये हर चीज़ में राय देंगे और लोग इनकी वजह से कुछ करेंगे ही नहीं तो ये गलत बात है ।
दरअसल हर इन्सान को पता होता है की क्या सही है क्या गलत । इन्सान को गलत काम कभी नहीं करना चाहिए और अगर वो सही है तो इन चार लोगों से नहीं डरना चाहिए ।
खेर अब आप लोग दूंढ़इए और समझिये की ये चार लोग हैं कौन जिन्होंने आपकी जिन्दगी में बड़ी उथल- पुथल मचा राखी है और जब आपको पता चल जाये तो तो आप भी उनके लिए उन चार लोगों में यथावत शामिल हो जाएँ और उनकी जिन्दगी भी चार लोगों के देखने और सुनने पर निर्भर कर दे । अब में भी यहीं समाप्त करता हूँ नहीं तो मुझे भी ...'चार लोग  देखेंगे तो बहुत कुछ कहेंगे ...!!!'    

Friday, March 23, 2012

Is the Universe Spinning? New Research Says "Yes"

Physicists and astronomers have long believed that the universe has mirror symmetry, like a basketball. But recent findings from the University of Michigan suggest that the shape of the Big Bang might be more complicated than previously thought, and that the early universe spun on an axis.Read more

Thursday, March 1, 2012

What Is RELIGION....??

धर्मं एक चिर-परिचित शब्द , जिसे हम अपनी बाल्यावस्था से ही अपने मन मष्तिस्क मे कंठस्त कर लेते है। हम कुछ और जान  पाए या नहीं, कुछ सोच सके या नहीं ..हम इस बात से जरुर अवगत हो जाते हैं की हमारा धर्मं क्या है।
हमारा धर्मं क्या है ..ये बात मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है और सबसे बड़े सवाल मे उभर कर आती है की आखिर " धर्मं क्या है?" ..क्योँ हम लोग जिन्दगी भर बिना सोचे समझे इस धर्मं का अनुसरण करते रहते हैं। अब अगर मैं ये कहूं की क्योँ न अनुसरण करें ..हमारे माता-पिता , हमारे पुर्वज इन वास्तविक और काल्पनिक मान्यताओं, नियम-कायदों का पालन करते आ रहे हैं, तो ये पक्ष भी विचारोयोक्त है।
अब अगर हम इसके दुसरे बिंदु पर गौर फरमाएं की हम अनुसरण करें तो क्योँ  करें ? हम क्योँ किसी भी मान्यता या नियम का पालन करें, हमे तथाकथित इश्वर ने मस्तिस्क प्रदत किया है, तो हम क्योँ बिना सोचे समझे कुछ भी मान ले।
इन सब प्रश्नों का उतर खोजने निकला जाये तो इन्सान को वास्तविक जड़ मे जाना होगा, हमे जानना होगा की आखिर 'धर्मं क्या है?' ..क्या तथाकथित इश्वर ने ऊपर से 'गीता' , 'कुरान' 'रामायण' 'bible'  और अन्य धर्म की किताबे  दी और कहा "हे मनुष्य ये धर्म ग्रन्थ मे तुम्हे दे रहा हूँ, अपने पूरे जीवन काल मे तुम इसी का अनुसरण करना अन्यथा तुम प्रकोप क भागीदारी बनोगे ।"
आखिर ये इतनी उलझी पहेली है क्या ?..विज्ञानं का छात्र होने क नाते (और न भी हूँ तो अपने विवेक से सोचने पर ) मैं इन बातों को मानने मे थोडा गुरेज करूंगा क्योंकि हम जानते है की 'इस धरती का जन्म कैसे हुआ था '...'कैसे इस पर जीवन की उत्पति हुई ..कैसे मनुष्य का प्रादुर्भाव इस धरा पर हुआ ..आदिकाल से लेकर आज के  इस नवीनतम युग तक किस तरह इन्सान ने अपने आप को परिवर्तित किया है।'
अब अगर इन सब बातों पर विचार किया जाय तो हम उस सवाल के जवाब थोडा निकट आ पाएंगे। आज दुनिया में बहुत से धर्मं है जिनका लोग अनुसरण करते हैं लेकिन अगर हम कहते हैं कि हमे उस इश्वर ने बनाया है तो हमारा-सबका धर्म एक ही होना चहिये।पुरातन काल से लेकर आज तक मनुष्य इतनी सारी सभ्यताओं का  अनुसरण करता आ रहा है तो ' इतनी विवधता क्योँ है..?' यही प्रश्न हमे और आपको कुछ सोचने पर मजबूर करता है।
हम अगर धर्मं को मनुष्य से  हटाकर सोचें तो हम ये पाएंगे कि मनुष्य जाति मे भी बहुत अधिक विवधता है । उसमे ये विवधता उसके प्राकर्तिक स्वरुप के कारण , जलवायु के कारण और अन्य बहुत से कारणों से है।अगर हम आदिकाल मे भी देखें तो कहीं मानव अधिक विकसित था तो कहीं कम । 'जब  थोडा विकास हुआ तो मानव "कबीलों" और " समूहों" में रहने लगा और संसार का हर कबीला और समूह एक दुसरे से भिन्न था और अलग अलग मान्यताओं का अनुसरण करता था ।
तो हम जरा गौर से इन सारी बातों को समझे तो हमे अपने सवाल का बहुत हद तक जवाब मिल गया है ।अगर मै सारे सवालों को एक-एक करके उठाऊँ तो सबसे पहले धर्मं क्या है -'दरसल हम धर्मं में तरह तरह क नियम कायदों का पालन करते है जो हमे सही ढंग से जीना सिखाते हैं, हम अपने जीवन को किस तरह सुनियोजित ढंग से जिससे हमे और समाज को एक नयी दिशा मिले , हमारा पूर्ण-रूपेण विकास हो सके, खुशाल जीवन व्यतीत कर सकें , किस तरह हमे रिश्तों का पालन करना चाइये जिससे समाज संगठित रूप से रह सके और प्रगति कर सके ।'
अब बात आती है कि इतने सारे धरम क्योँ है ?  कैसे हुआ इतने धर्मो का विकास ?
तो इस पर हम अगर वर्णित किये गए आदिकाल से देखे तो ऊतर मिल जायेगा। "जिस तरह दुनिया में हजारों कबीलों और समूहों में लोग रहते थे , और सबकी मान्यताएं अलग थी , वहीँ से धर्मं का विकास शुरू हुआ।
मनुष्य इन छोटे समूहों में नियम कायदे बनाकर रहता था जिससे सही ढंग से जीवन यापन कर सके , धीरे-धीरे छोटे समूह बड़े समूहों में तब्दील हो गए , जिन समूहों क विचारों में थोड़ी समानता थी उन्होंने थोड़े फेरबदल कर के एक नयी विचार धरा को रखकर एक बड़े समूह का संघटन किया । धीरे-धीरे ये समूह और बड़े होते गए और इनकी विचारधारा ने धर्मं कि शक्ल इख़्तियार कि जिसको समाज के बड़े हिस्से मे पालन किया जाने लगा।"
  अंततः  हम ये कह सकते हैं कि धर्मं हमे यही सिखाते है कि किस तरह आप नियमों का पालन कर के एक खुशाल जीवन बिता सकते हैं तथा अपने और समाज का विकास कर सकते हैं ।